Wednesday, August 17, 2011

मीना कामलेकी कविता




खोज 


त्वचा की तरह
कैसी चिपक गयी है मुझे यह जाति
कभी मैं खुजलाने लगती हूँ लगातार 
तो भभूत की भांति उडती रहती है
और फिर एकदम चिपक जाती है यह जाति.
मैं सिंगार करती हूँ
उन्हें चकमे में डाल देने के लिए.
लेकिन लोग ऐसे धोखा खा जायेंगे  क्या?
ऊपर नीचे उथलपुथल करके
ढूंढ लायेंगे  मेरा असली लिबास.
अब इस जाति का मैं क्या करूँ?
केंचुली की तरह उतारकर
उसे फेंक आऊँ गहरे समन्दर में?
लेकिन उससे  भी
कहाँ चैन मिलने वाला है?
ये लोग तो समुद्रमंथन करेंगे
और खींच के ले आयेंगे
मेरी जाति को
समंदर की तह से भी.  
अब तो मैं
जाति को निगल जाये ऐसे 
किसी  नीलकंठ की
राह में आँखें बिछाकर बैठी हूँ.

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