काव्य का मूल्य
मेरे काव्य का मूल्य तुम समझ न पाओगे.
भले ही ‘नवचेतन’* उसे निश्चेतन समझे
‘कुमार’*की काव्यसृष्टि के लिए वह नेपथ्यवासी भली ही रहता
‘कविता’*को कविता द्वारा जीवित रखनेवाले मित्र
भली ही उसकी गणना अकवितामें करें.
एक समालोचक मित्र तो कहते रहते थे कि
‘शैली और भाषाके अनेक काले कलंक मौजूद हैं तुम्हारे काव्योंमें.’
‘कलंक ही काले नहीँ हैं, हमारा तो सूरज भी काला है.
‘काला सूरज’ लेकर हम तो बस निकल पड़े हैं ,
उसका उजाला तुम्हारी अंध आँखें पहचान न पाएंगीं.
भले ही तुम न समझ पाओ मेरे काव्यका मूल्य !
मैं कवि होना नहीं चाहता,
मैं तो विद्रोही होना चाहता हूँ विद्रोही.
विद्रोह का एक आध शब्द भी
अगर ठाकुर वजेसिंघ के बधिर कान पर
टकराएगा
तो मेरी द्रष्टि में मेरे काव्य का मूल्य अमूल्य होगा.
* गुजराती साहित्यिक पत्रिकाओं के नाम
***
सावधान
सावधान !
बीजली का दबाव ४६० वोल्ट !
हर २४ घण्टे, एक शुद्र श्वास का अंत.
हर बसंत,एक हत्याकाण्ड.
श्रम की भीख माँगता मानव हाथ .
फटेहाल यौवन भटकता.
अस्मिता का कुचला जाना.
कन्या का कौमार्यभोग.
काले लहु के फव्वारे.
फिर भी
आकाश चुप ,
पृथ्वी चुप,
चुप सारे जीवजन्तु,
जगह जगह भटकते साये पानी के लिए ,
सर्वत्र बालचीख.
हम अहमदाबाद में एस.सी.
खडोल में लागी.
एक टुकड़ा रोटी,
चिलचिलाती धुप,
एक रिज़र्वेशन,
और अनंत हत्याकाण्ड.
सावधान करना था न मुझे
जब मैं गर्भस्थ था !

No comments:
Post a Comment