Friday, August 5, 2011

भी.न.वणकर की कविता



 
 













ओवर ब्रिज

यह  गाय 
हमारे घर
कभी आयी नहीं,
रम्भाई नहीं,
या तो दूध भी दिया नहीं.
फिर विषाद या विवाद क्या ?
वैतरणी पार करने के लिए तो
हम ओवरब्रिज बांध देंगे.

***

चमगादड गृह

सामने
यह इमारत जो खड़ी है
वैसे तो मैं उसकी नींव का पत्थर हूँ
मैंने उसे बहुत मेहनत से खड़ा किया है
सच कहता हूँ
मैंने सर्वदा सर्वमंगल की ही कामना कि थी .
लेकिन वर्ण-वर्गके चमगादडों ने
धर्म के नाम पर
अर्थ के नाम पर
काम के नाम पर
मोक्ष के नाम पर
इस इमारत में अड्डा जमा दिया
और धीरे धीरे अधिपति बन गए.
मेरे नाक, कान, आँख और अंगूठा
अरे धड़ भी
और अब तो मेरे समूचे अस्तित्व को
ग्रस रहे हैं.
इसी लिए तो मैं उस चमगादड गृह के
बदबूदार खंडहर पर
थू थू कर
चल पड़ा हूँ.

***

ग्यारहवीं दिशा 

श्रुति –स्मृति
शास्त्रों के नाम पर
षड्यंत्र रच कर
हमारे ध्यानस्थ सर छेd  दीये.
और कलावान   अंगूठे दान में ले लिये
अपमानित किया, उपेक्षित किया
हमारी अस्मिता को.
हमें बहरे,गूंगे-अंधे-अपाहिज बनाकर
’मानव श्रेष्ठ महान’की का गान किया.
अस्तित्व की  आख़िरी जंगमें
झंझावात ही झंझावात
चौकोर झंझावात.
तमाम षड्यंत्र खुल  जाएंगे
और जिजीविषा के कितने ही ऊँट 
धंस जायेंगे  रेत में.
उसके बाद रेगिस्तान
तमाम, दसों दिशाओं में हो जाएगा अंध
और विस्तीर्ण होता जाएगा कुरुक्षेत्र
ग्यारहवीं दिशा की ओर.

No comments:

Post a Comment