Monday, July 28, 2025

मधुकान्त कल्पितकी कविता



हमें अधिकार दो

अब चुप है मिलकी  व्हीसलें 
जैसे सन्नाटा ओढकर सो गयी है
अहमदाबादकी शान और शौकत.
मुंह खंगालकर
कंधे पर कमीज़ डालकर
कच्ची नींद मसलता
तीसरी पारीका कपड़ामील कामगार
मुर्गेबकरेसे खचाखच चालके बीच होकर
धडाधड भागनेके बजाय
अब टूटीफूटी खाट पर लेटा रहता है.
रातदिन उसकी साँसकी  सीटियाँ बजतीं रहतीं हैं.
पुरानी यादें
फकफक रूला देती हैं उसकी घरवाली को
जिसे निश्वास रखनेके लिए
आकाश भी कम पड जाता है  
सिगरी में जला हुआ बुरादा ओढकर
उसके नंगधड़ंग बच्चे सोये  हुए हैं बरामदेमें.
उनकी आंखो मे
रौब से गुजर जाता है आजादी की पचासवीं सालगिरह का रथ .
मुंह अँधेरे
कंधे पर झोले डाले
चुननेके लिए निकल पड़ती हैं
उनकी जवानीके कगार पर खड़ीं लडकीयाँ.
कूड़ेदान में  ढूँढतीं हैं वे अपना भविष्य.
उनके पोरों पर पड़े हैं निराक्षरता के गहन घाव.
रद्दी कागज़ चुनते चुनते
तारकोल की   सड़कों पर लहुलुहान उंगलीयोंसे
वे लिखती है,
‘हमें अधिकार दो’.

***


स्वयंसे

जहाँ मुझे रोपा गया है
उस वातावरण की
घुटनसे
मुक्त होने के
सुंदर सपने में
स्वयं को डूबानेकी  
या तो
टूटकर मिट्टीके ढेलेसे लगे रहे तंतुको
सहलानेकी चेष्टा करते हुए
स्वयंको
मैं जब सह  लेता हूँ अनमना .
लेकिन जब सह लेता हूँ
उस पलके लिए मैं , मैं नहीं रहता.
सहनशीलता की गोदमें बैठनेकी आदी
उस स्साली जात को
हाक् थू.

***


गतिपर्व

आज बीच हथेली
ज्वाला होकर बैठी जात.
पोरों पर आज  एक शब्द 
स्पष्ट उभरता
फूंफकारता.
कितनी ही सदियोंसे 
अन्धकार की चादर ओढ़े
सोया हुआ 
लहू
किनारे तोड़ फोड़ कर
उँगलियाँ पर 
सवार होकर
खुद गरजता
दौडा.

***

ज्वाला गीत

आवाज़ दे कर 
सचमुच् ही कौन, ले चला मुझे यहाँ से भगा कर?
सिर झुकाकर जीने की आदत, आदत नहीं है, वो तो है धू धू पीड़ा,
झाँक जरा जो  भीतर,
देखोगे प्रथाओं के कुलबुलाते कीड़े.

इन्सान हो तुम, उठो,
अरे, यह कौन गुज़र गया, मुझे विह्वल जगा कर?
हथेली में उग आयी है एक रेखा, रखा है नाम उसका  चेतना,
मुरझाया मन ऐसे उड़ने चला
यह बात अब कोई नहीं मानता।

राख  तले सोयी, मैं आग हूँ
फूंक लगी हल्की सी, जाग गया हूँ फूंफकारता।

***

मजबूरी

शस्त्र और शास्त्र
दोनों आपके हाथोंमें,
हम खाली हाथ.
बोलते हैं,
चिल्लाते है,
और जोर से चिल्लाते हैं.
सिर फोड़ते  है.
तुम 
धीरे से मुस्करा देते हो
मुस्कराते ही रहते हो
हम पर
हमारे खाली हाथों पर.

***

धुआँ

अब हवा में फड़फड़ा रहा है 
ज़िन्दगी का जीर्णशीर्ण वस्त्र.
उसके एकाध टुकड़े को जैसे ही ले आता हूँ
घ्राण के निकट
उसमें से निकलती
धुएँ की तीव्र बास,
मेरे चित्तमें जगा देती है पुराना संस्कार.
यह बास
पियक्कड़ों द्वारा जिनकी हत्या कर दी गयी
ऐसे मेरे निर्दोष पूर्वजों के अर्धदग्ध देह की तो नहीं?
उन के रक्त माँस सिझने की आवाज
क्यों बारबार प्रतिध्वनित हो रही है
मेरी चेतना के गुम्बज में?
अग्नि ज्वालाओं में भस्मिभूत
मेरे पूर्वजों के बसेरों की जलती ज्वालाओं के उजाले में
आज मैं सिख रहा हूँ
पदार्थ पाठ.
इसी लिए तो
डरावना अतीत जैसे ही
मेरे मुहल्ले में दिखता है
मेरी मुठ्ठियाँ तन जाती है
सख्त.

***


मौका

सोमपुरा को मिला नहीं
वह , मैं पत्थर.
गाँव के छोर पर
इधर उधर मैं 
भटक रहा हूँ,
अंदर अंदर
खुदको
खटक रहा हूँ.

***

मैं

वैसे तो
मेरे भीतर दो लोग जी रहे हैं.
एक
परंपरा के बोज से झुका हुआ
चूपचाप घसीटा जाता
और
दूसरा 
यातनाओं के खुले जबड़े के बीच भी
क्रुद्ध ,आक्रमक और अडिग.

एक 
मजबूर चेहरा
कंपकंपाता सांस लेता,
दूसरा
स्वयं ज्वाला बन कर
प्रत्येक हिलचल को प्रजवलित करता हुआ.

एक 
रूढ़िगत विभावनाओं से
जकड़ा हुआ,

दूसरा 
खुदको खकझोरने के लिए
दूसरी ही प्रक्रिया आजमाता  

में तो चाहता था 
सिर्फ एक ही किस्म की जिंदगी जीना.
आज मैंने 
मूंद कर आंखें,
गहरी सांस लेकर
एक निर्धारित समय का दरवाजा खोलता हूँ.
और अरे,
देखो ,
खड़ा हूँ 
उन्नत मस्तक
बिल्कुल
आपके सामने.

***

Sunday, October 24, 2021

महर्षि ब्रह्म चमार की कविता


निश्चय

मेरे आँसु की एक बूँदकी कीमत
खून के जितनी
लगायी गयी
तब समझ में आया 
कि यहाँ तो
खून की नदियां बह रही है.

वाणी के ज़ख्म
और 
चाबुक के प्रहार.
मेरी देह है
ऐसा एहसास
कितने ही साल के बाद
आज मुझे हो रहा है.

वही अंतिम घर है मेरा.
अब जो खून बह गया है
उसे इतिहासमें मढ़ देना है,
मैंने किया है यह निश्चय!

कुसुम डाभी की कविता


मानसिक गुलाम

तेरे दिमागमें कैसे सवाल उठने चाहिए
यह हम तय करेंगे

तुम्हैं 
क्या कहना
क्या पीना
क्या पहनना
क्या ओढ़ना
हम तय करेंगे
 
तुम्हें 
क्या अध्ययन करना
क्या पढ़ना
क्या लिखना
हम तय करेंगे

तुम्हें 
किसे दान देना
कहाँ घूमने जाना
किस धर्मको मानना
हम तय करेंगे

तुम्हें
कौनसी फ़िल्म सीरियल देखना है
भजन सुनना या गजल
हम ही तय करेंगे

तुम्हें 
किससे करना है 
प्यार या नफरत
किससे करनी है शादी
कितने पैदा करना है बच्चे
सुन, वह भी हम ही तय करेंगे

तुझे 
जीना है
मरना है 
आत्महत्या करनी है
सुन, वह हमीं तय करेंगे

अगर तुम्हें लगता है
तुम स्वतंत्र हो
स्वयं निर्णय करते हो
तुम चाहो ऐसा जीते हो
तुम जो चाहते हो वही करते हो
तो सुन, दुबारा
दोस्त, यह तेरा वहम है
तेरा दिमाग हैक किया गया है
तुम महज कठपुतली हो
नाचते हो
कूदते हो
दौड़ते हो
खेलते हो
गाते हो
जीते हो
मरते हो
सब कुछ होता है
हमारे कहने के मुताबिक

करोड़ो 
तैयार हैं
तुम भी हो 
उनमेंसे एक।

Saturday, October 23, 2021

नगीनचन्द्र डोडिया की कविता


मेरा बाप

इस देशका यह दोष है
जिसने बापको मेरे
इस देशकी भूमि पर  
सिर उठाकर
जीने न दिया
उम्रभर.

उम्रभर जिसने पीया पसीना
जब भी प्यास लगी
(किसीका न खून पीया)
रोटीके टूकडेमें
जी रहे जिंदगी मेरे बापको
(किसीकी न रोटी छीन ली)

बाप मेरा 
जिसने लिया नहीं सरकारसे
सर्टिफेकट (बिलकुल जूठा)
स्वातंत्र्यसेनानी होनेका
न ही खाया कोई पेंशन.
न ही जिसने कभी
हाथ जोड़कर  वोट मांगकर
देशकी जनताको उल्लू बनाया.

बाप मेरा
जिसने  खाद्यान्नमें मिलावट कभी न कि,
न किसी जानको जोखिममें डाला.
जिंदगीमें  कभी न फैलाया हाथ
ना किसीकी बहन-बेटीकी इज्जत पे हाथ डाला.
फिरभी लानत है  इस देशकी कातिल प्रजाको
जिसने बापको मेरे
इस देशकी भूमि पर  
सिर उठा का
जीने न दिया
उम्रभर.

बाप मेरा 
जिसने उम्रभर
कभी न फैलाया हाथ किसीके सामने,
न ही याचना कि दयाकी
जिनेकी खातिर न कभी वो गीडगीडाया
फिर भी ऐसे मेरे बापको
इस देशके नापाक लोगोंने
कभी जीने न दीया
सिर उठा कर
उम्रभर.

पुत्र मेरा
आगे चलकर
लेकिन
कभी न कहेगा ऐसा.

अपूर्व अमीन की कविता


न ही छंद निकलता है
न ही अलंकार
न ही बाहर आता है हमारे शब्दों से श्रृंगार
मूंह खोलते ही 
चीखें निकालतीं  क्रुद्ध कविता निकलती है।
मधुर रस नहीं निकलता हमारे कंठसे
जैसे ही जुबान हिलती है, गाली निकलती है.
कुचली हुई क्रोधित कविता सदा ही व्याकरण हिन निकलती हैं
न ही हल्की  बूंदाबांदी में प्रेम कविता निकलती है
गला फटते ही तुरन्त बरसों से तपती गर्मियों में  दोपहर में खड़ी रखी आग निकलती है.
शातिर रोना नहीं आता हैं न ही कृत्रिम हास्य,
जैसे ही मुंह खोलते हैं नाखून गड़ाती जाति बाहर निकलती है.
हमारे लेखन में न ही फूल बाहर आते हैं
न ही झरने और प्रपात आते हैं
जैसे ही छिड़कते हैं स्याही, कुचले हुए हाथों में तेजाबी तलवारें बाहर निकलतीं हैं.
अगर शहरमें आँधी तूफान आ जाता है ,
कब्र चीर कर मुर्दे बाहर निकल आते हैं.
न छंद आते हैं , न ही अलंकार आते हैं
मुंह खोलते ही स्वर पेटी से रोक दिया गया था वह आक्रोश बाहर निकल आता है.

Saturday, May 16, 2015

निलेश काथडकी कविता

छूआछूत


 


















तेरे दो हाथ है
मेरे भी  .

तेरे दो पैर है
मेरे भी .

तेरे आँख,कान, नाक और मुँह है
मेरे भी

 तुम बोलते हो
मैं भी .

तेरा नाम है
मेरा भी .

तुम साँस लेते हो
मैं भी .

तुम इंसान हो
मैं भी .

फिर भी कितना फर्क है
तुम गाँवके अन्दर  और मैं गाँव बाहर
और दोनोंके बीच
रहती है छूआछूत